मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कच्चाथीवू को लेकर राजनीतिक सर-गर्मियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस विवाद को लेकर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। वहीं, अब 2015 से 2018 तक जाफना में भारत के महावाणिज्यदूत के रूप में कार्य करने वाले सेवानिवृत्त भारतीय विदेश सेवा अधिकारी ए. नटराजन ने कहा है कि कच्चाथीवू को लगभग 50 साल पहले श्रीलंका को सौंप दिया गया था और भारत सरकार तब किए गए समझौते की अवहेलना नहीं कर सकती है।
मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार, उन्होंने कहा, हम उस बारे में बात कर रहे हैं जो एक सरकार ने 50 साल पहले किया था। इसका मतलब यह नहीं है कि अगली सरकार को इसे पुनः प्राप्त करना होगा। समझौता तो समझौता है। हमें समझौतों का सम्मान करना होगा। आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। देशों पर विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा शासन किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप एक सरकार द्वारा किए गए समझौतों की अवहेलना करें। श्रीलंका सरकार को हमारे मछुआरों को अपने पानी में मछली पकड़ने की अनुमति देनी चाहिए थी। समस्या उन बॉटम ट्रॉलरों को लेकर है जिनका इस्तेमाल श्रीलंकाई सरकार और उत्तरी श्रीलंका के मछुआरे कहते हैं कि भारतीय मछुआरे करते हैं।
जानकारी के लिए बता दे, कच्चाथीवू विवाद पर श्रीलंका की ओर से पहली प्रतिक्रिया में विदेश मंत्री अली साबरी ने बुधवार को कहा कि यह मुद्दा 50 साल पहले सुलझा लिया गया था और इस पर दोबारा विचार करने की कोई जरूरत नहीं है। सबरी ने इफ्तार रात्रिभोज में सवालों के जवाब में कहा, कोई विवाद नहीं है। वे इस बारे में आंतरिक राजनीतिक बहस कर रहे हैं कि कौन जिम्मेदार है। इसके अलावा, कोई भी कच्चाथीवू पर दावा करने के बारे में बात नहीं कर रहा है। भाजपा ने नेहरू और बाद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकारों पर श्रीलंका के दबाव में द्वीप छोड़ने का आरोप लगाया है।
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