मीडिया सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, भारत और ओमान के बीच समुद्री रिश्तों को नई दिशा देने वाला पल सामने आया है। इसके तहत भारतीय नौसेना के स्वदेशी स्वदेशी रूप से निर्मित पारंपरिक शैली के पोत आइएनएसवी कौंडिन्य ने गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक 18 दिनों की साहसिक और ऐतिहासिक यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। इस अवसर पर केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह जहाज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन का प्रतीक है। यह पोत 29 दिसंबर, 2025 को गुजरात के पोरबंदर से रवाना हुआ था। कमांडर विकास शेओरान इस अभियान के कप्तान थे, जबकि कमांडर वाई हेमंत कुमार अभियान के प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। हेमंत कुमार परियोजना की अवधारणा से ही इससे जुड़े हुए हैं। दल में चार अधिकारी और 13 नौसैनिक शामिल थे। मस्कट के सुल्तान काबूस बंदरगाह पहुंचने पर कौंडिन्य को वाटर सैल्यूट (जल सलामी) दिया गया। इस समारोह में केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, मस्कट स्थित भारतीय दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी, ओमान के विरासत और पर्यटन मंत्रालय के अधिकारी और ओमान की रायल नेवी के अधिकारी भी उपस्थित थे।
मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पोत भारत के पुराने समुद्री रास्तों को फिर से जिंदा करेगा। यह जहाज हिन्द महासागर की दुनिया से भारत के हजारों साल पुराने रिश्तों को दिखाएगा। इस यात्रा से भारत की पुरानी पोत बनाने की कला और समुद्री परंपराएं फिर से सामने आएंगी। पोत पर सवार आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने बताया कि परियोजना यह भी दर्शाती है कि प्राचीन भारत, जिस पर हमें बहुत गर्व है, वास्तव में जोखिम उठाने वाले, साहसी और व्यापारियों पर आधारित था, जिन्होंने नए बाजारों और नई भूमि की खोज की, संस्कृति का प्रसार किया और उनसे नए विचार भी ग्रहण किए। हजारों साल पहले हिन्द महासागर के इस विशाल क्षेत्र का अन्वेषण किया। इसलिए एक तरह से हम उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। 65 फुट लंबी इस नौका का निर्माण पारंपरिक सिलाई तकनीक से किया गया है, जिसमें प्राकृतिक सामग्रियों और सदियों पुरानी विधियों का उपयोग किया गया है। यह पोत पांचवीं शताब्दी की एक नौका का पुनर्निर्माण है और प्राचीन अजंता गुफाओं के एक चित्र से प्रेरित है। इस पोत का नाम पौराणिक नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने प्राचीन काल में भारत से दक्षिण पूर्व एशिया की यात्रा की थी। यह पोत एक समुद्री राष्ट्र के रूप में भारत की ऐतिहासिक भूमिका का प्रतीक है।
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