भोपाल के छान स्थित महर्षि उत्सव भवन में वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी डॉ गिरीश जी के मार्गदर्शन में विश्व शांति के लिए चल रहे श्रीमद् देवी भागवत पुराण के छठवें दिन आचार्य डॉ निलिम्प त्रिपाठी ने मां कात्यायनी की महिमा बताई। श्री रामचरित सुनाते हुए उनके विवाह में भी मां कात्यायनी की ही कृपा का प्रभाव बताया। उन्होंने भगवती महामाया, माँ लक्ष्मी, श्री राधा रानी और देवी के विभिन्न स्वरूपों के चरित् और उनकी असीम कृपा का वर्णन किया जाता है।

छठे स्कंध में वर्णित शक्ति चरित् के माध्यम से यह समझाया कि संसार की मोह-माया और मायावती शक्तियों से किस प्रकार बचा जा सकता है। कथा में माँ के दिव्य भजनों और मनमोहक झांकियों का आयोजन हो रहा है। माता कात्यायनी का हमारे शरीर के सात चक्रों में आज्ञा चक्र में स्थान है। विशुद्धि चक्र के बाद दोनों नेत्रों के मध्य, जहाँ तीसरा नेत्र होता है, वहीं आज्ञा चक्र है। इसे हमारी अंतर्दृष्टि का सूचना-तंत्र भी माना गया है। मानसिक रूप से यह चक्र दृश्य चेतना से जुड़ा है, और भावनात्मक रूप से यह शुद्धता के साथ सहज ज्ञान के स्तर से जुड़ा है।
इस चक्र का प्रतीक है -दो पंखुड़ियों वाला कमल। इसका मुख्य विषय है “मैं सब कुछ जानता हूँ” और “मैं कुछ भी नहीं” – इन दोनों के बीच में समत्व।
कत ऋषि के पुत्र थे – कात्यायन। उन्होंने महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर कठोर तपस्या की।
कथा है कि दानव रम्भ और महिषी से उत्पन्न हुआ था महिषासुर। उसे वरदान था कि वह जब चाहे रूप बदल सकता है।
सब देवता त्रस्त थे। तब कात्यायन ऋषि ने आदिशक्ति की प्रार्थना की। माँ प्रसन्न हुईं और उनकी पुत्री के रूप में अवतरित हुईं – इसलिए नाम पड़ा कात्यायनी।
फिर देवताओं ने अपने-अपने दिव्यास्त्रों से देवी को सजाया। देवी युद्ध के लिए गईं और रूप बदलते महिषासुर का वध किया।
माँ का स्वरूप –
चार भुजाओं वाली माँ, सिंह पर सवार। ऊपर की दाहिनी भुजा अभय मुद्रा में, नीचे की वरद मुद्रा में। बाईं ओर ऊपर तलवार और नीचे कमल है।
ग्रंथों में क्या कहा?
– अमरकोष में – देवी पार्वती के ही एक रूप को कात्यायनी कहा गया है।
– शाक्त सम्प्रदाय में – इन्हें शक्ति की देवी दुर्गा, भद्रकाली और चंडिका कहा है।
– स्कन्द पुराण में – इन्हें परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न देवी कहा है।
– ब्रज में – इन्हें ब्रज की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। गोपियों ने इन्हीं की आराधना करके श्रीकृष्ण को पति रूप में पाया था।
इनकी उपासना परम पद को देने वाली और अमोघ फलदायिनी है। विवाह और संतान संबंधी बाधाएँ इनकी पूजा से दूर होती हैं।
आज्ञा चक्र का अर्थ है – आदेश। यह वह स्थान है जहाँ से हम अपने जीवन को आदेश देते हैं। महिषासुर रूप बदलने वाला मन है। कभी आलसी बन जाता है, कभी क्रोधी, कभी लोभी। कात्यायनी वही शक्ति है जो इस रूप बदलते मन को पहचान कर मारती है।
महिष का अर्थ है – भैंसा। भैंसा जिद्दी होता है। जो एक बार बैठ गया, तो उठता ही नहीं। हमारे भीतर भी एक भैंसा है – “मैंने जो सोच लिया, वही सही है।” यही जिद्दी अहंकार महिषासुर है। माँ कात्यायनी तलवार से इसी जिद को काटती हैं।
आज्ञा चक्र पर दो पंखुड़ियाँ हैं – एक कहती है – “मैं”, दूसरी कहती है – “तू”। जब तक “मैं” और “तू” अलग हैं, तब तक द्वंद्व है। कात्यायनी की साधना इन दोनों को एक कर देती है। तभी तीसरा नेत्र खुलता है। कात्यायनी वह शक्ति है जो प्रेम को पवित्र करती है। आज की बेटियों को भी यदि सच्चा जीवनसाथी चाहिए, तो पहले अपनी आज्ञा चक्र को – अपनी दृष्टि को – शुद्ध करना होगा। दृष्टि शुद्ध, तो सृष्टि शुद्ध। जब मन बहुत भटके, रूप बदले, निर्णय न ले पाए, तो दोनों भौंहों के बीच माँ कात्यायनी का ध्यान करें। “ॐ कात्यायन्यै नमः” का जाप करें।
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