(भोपाल): श्रीमद् देवी भागवत कथा के सातवें दिन गूंजे देवी के जयकारे, आचार्य डॉ निलिम्प त्रिपाठी जी ने सुनाई ‘देवी गीता’ और शाकंभरी महिमा
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ के सातवें दिन कथा व्यास पूज्य गुरुदेव डॉ निलिम्प त्रिपाठी द्वारा मां भगवती के परम दिव्य और दार्शनिक स्वरूप की व्याख्या की गई। मां जगदंबा के विभिन्न स्वरूपों और सातवें स्कंध के प्रसंगों का बहुत ही सुंदर वर्णन हुआ।

* देवी गीता का सार: सातवें स्कंध में आने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रसंग ‘देवी गीता’ पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल शक्ति मां भगवती (ब्रह्म) ही हैं। जब जीव अपने अहंकार और मोह को त्यागकर आत्मा और परमात्मा (ब्रह्म) की एकता को समझ लेता है, तभी उसे वास्तविक आध्यात्मिक मुक्ति (कैवल्य) प्राप्त होती है।
* दुर्गामासुर वध और शाकंभरी अवतार: कथा के दौरान मां दुर्गा द्वारा भयावह असुर ‘दुर्गामासुर’ के वध और अकाल के समय पृथ्वी पर शाकंभरी देवी के रूप में प्रकट होकर समस्त जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की रक्षा करने की अद्भुत लीला का वर्णन किया गया।
* भक्ति और त्याग का संदेश: व्यासपीठ से आचार्य डॉ निलिम्प त्रिपाठी ने यह संदेश दिया गया कि कलियुग में माता भगवती की शरण में जाने से सभी प्रकार के कष्टों, संतापों और दुखों का नाश होता है। सच्चे मन से किया गया देवी का स्मरण मनुष्य को सत्कर्मों की प्रेरणा देता है।
संपूर्ण कार्यक्रम महर्षि संस्थान के छान परिसर में वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी डॉ गिरीश जी के मार्गदर्शन में संपन्न हो रहा है।
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